Hey, I am on Matrubharti!

?? ग़ज़ल??
एक ग़ज़ल मां पर हमारी

? हरा पीपल, घना बरगद सुनो तुलसी है मेरी मां
मेरा आंचल कभी दर्पण बनी बदली है मेरी मां।
? मैं फल हूं मां की मन्नत का जो दुर्गा मां ने बक्शा है
मिटाऊ जुल्म दुनिया से सदा कहती है मेरी मां
? सदा धरती गगन से बेटी पल-पल अपना रिश्ता रख
यही एक बात शिद्दत से सदा कहती है मेरी मां।
? बहोत ढूंढा ,बहोत देखा, बहुत जांचा बहुत, बहुत परखा
नहीं दुनिया में कोई शैय तेरे जैसी है मेरी मां।
? नहीं है पास है लेकिन रूह में मेरी समाई है
मेरे भीतर सभी कहते हैं के दिखती है मेरी मां।
? तेरा सर गोद में रख रख के आ तेरी बालाएं लू
"प्रीत"अंदर तेरी ममता उभर आई है मेरी मां।
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More

#चेहरा ?राज छिपे चेहरों के?
दिवाली की रात है,
जाने क्या गज़ब ढाने गई है वो।
लौट के कब आएगी,
चंद तोहफे लाएगी।
भूख प्यास से,
बिलख रही थी,
उससे जुड़ी जिंदगीया
अरमानों की सूखी पड़ी थी अमराईया
आरजूए खोई थी अंधेरी गुफाओं में,
पर अचानक,
कुछ पल में बजने लगी
खुशियों की वहां शहनाइयां,
कुछ पाने के लिए,
क्या खोकर है वो आई,
पेट भरने गई थी,
पर शायद कोख,
मैं कालिख भर लाई,
इस बात से अंजान
है सब,
खुश खुश हो गए,
चंद पलों की
उधार मिली खुशियों
के मेले में,
किसके चेहरे को,
पढ़ा जाए
किसके दर्द का
मातम मनाया जाए
और किसकी खुशियों की
नजर उतारी जाए

इस बात से
हर एक चेहरा,
दूसरे चेहरे से,
शायद जानबूझकर,
अनजान है
हां शायद सभी जानते हैं
फिर भी अनदेखा
कर रहे हैं,
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More

?? शूलशैया??
शूल शैया पर लेटे भीष्म पितामह के इच्छा मृत्यु के वरदान को आज अभिशप्त साबित करता यह एक-एक पल एक -एक युग सा भीष्म पितामह को महसूस हो रहा था।
दर्द जिस्म के पोर - पोर से लहू बनकर सैलाब ला चुका था।
विडंबना यह कि मुख से आह भी निकालना स्वयं का तिरस्कार करने के समान था।
कांटों के बिछौने पर लेटी अपनी अधमरी लाश का बोझ उनके लिए असहनीय हो गया था।
कभी बंद तो ,कभी खुली आंखों से ,अतीत का एक एक दृश्य चलचित्र सा लहरा रहा था।
अपने कर्मों का लेखा जोखा उन्होंने स्वयं लिखा था मानो------
पर मेरे पापा अपने ऐसे कौन से कर्मों का फल भुगत रहे हैं, यह वह स्वयं तो क्या , उनसे जुड़ी हर जिंदगी अन्जान है।
हर पल हर घड़ी इंसानियत का मान रखता , यह देवता सा इंसान ,हर पल तैयार रहता हर किसी के आंसू पोंछने,और उनका दर्द स्वयं के सीने में भर के अकेले में उनके लिए रोता हुआ दिखता ।
खुद भूखा रहकर भूखे को भोजन कराता था, कंगाली की हालत में भी जरूरतमंदों को रुपयों से मदद करता।
सदा ईश्वर की आराधना मै लीन नतमस्तक हो जीवन जीता।
अपने परिवार का इकलौता रक्षक, दया, ममता त्याग का जीता जागता, अपने आचरण, सदाचार से, वाणी में सरस्वती का निवास, सौम्यता पोर-पोर में समाई ऐसा जीवन जीते आया था।।
पर प्रकृति का क्रूर प्रहार उनकी सच्चाई ,अच्छाई पर बहुत बुरी तरह हुआ।
अकस्मात हुए इस वार का सामना करना जितना उनके लिए मुश्किल था , उससे कहीं ज्यादा उनके परिवार में पत्नी, तीन बेटों और एक बेटी के लिए था।
आज मृत्यु शैया उनको शूल शैया से कम नहीं लग रही थी।
पल-पल स्वयं मृत्यु का इंतजार----------उफ-----
कितना भयानक, कितना दर्द, कितनी तड़प-----
हर पल ईश्वर से प्रार्थना करता की------
हे ईश्वर अब दे दो इस दर्द से निजात , अब नहीं सहा जा रहा है जिस्म से रिसता दर्द का सैलाब।
मुझे समा लो प्रभु अपने में ही जल्दी खत्म कर दो मेरी इहलीला।
पर जन्म मृत्यु इंसान के बस में नहीं है।
कोई तो है जो अदृश्य हो चला रहा है इस चक्र को, शायद उसे हमने भगवान ,ईश्वर ,परमात्मा का नाम दे दिया है।
खैर जो भी है पर मेरे पिता , जी हां मेरी जान से भी प्यारे ,मुझे जिंदगी सिखाते, जीने के संघर्ष को सिखलाते, मेरे हीरो ,मेरे आइडल ,मेरे दोस्त-----
मेरे सब कुछ खास सब कुछ बस मेरे पापा --- पापा --- पापा-----
गले को कैंसर ने अपने अधिकार में ले लिया था।
बहुत दिनों से खाने-पीने में तकलीफ हो रही थी, दर्द भी बहुत था।
शुरुआत में तो हर बीमार अपने फैमिली डॉक्टर के पास ही जाता है
छोटी बीमारी का जामा पहनाते शहर के बहुत से डॉक्टर से इलाज करवाया।
कोई कहता ----- सर्दी की वजह से टॉन्सिल बढ़ गए हैं, कोई कहता मामूली सी तकलीफ है इंफेक्शन है कुछ दिन में ठीक हो जाएगा।
बस सब अपना अपना उल्लू सीधा करने में एक इंसान की जिंदगी को दांव पर लगा देते है।
आखिर में निष्कर्ष निकला और वह भी की गले की स्वर नली में कैंसर है-------
शून्य के घेरे में जिंदगी सिमट गई----
पत्नी बच्चे सब टूट गए, प्यार, ममता, और दर्द का दरिया सबकी आंखों से बह निकला।
मेरी मां---------
वात्सल्य , ममता की जीती जागती इस दुनिया में हम सब के लिए ईश्वर का अवतार।
अकस्मात हुए इस ना मिटने वाले रोग पर भी पापा ने हंसकर कहा था कि सब ईश्वर की मर्जी है वह जो करता है उसमें ही सबका भला होता है मुझे कोई अफसोस नहीं है कि मुझे इस भयंकर बीमारी ने अपनी और जकड़ लिया है बस तुम सब की चिंता है तुम सब मेरे बगैर जीने की अभी से आदत डाल लो।
मां - पापा के प्रेम की मिसाले पूरा समाज देता है।
हर मिलने वाला उनके प्रेम भरे स्वभाव ,अपनेपन का दीवाना हो जाता था।
सफर शुरू हुआ मुंबई का , देश के सबसे बड़े हॉस्पिटल टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का------
इंसानी हांड मांस का सामना उन तमाम मशीनों से जूझना जो सही मायने में शरीर राख करने में कहीं भी पीछे नहीं हटती।
असहनीय पीड़ा सहते पापा कभी जुबां से उफ़ भी ना करते।
क्योंकि उनका उफ़ करना उनके परिवार को तकलीफ दे जाता।।
ख़ामोशी से दर्द सहते------
आज पापा का ऑपरेशन मुंबई में करना तय हुआ।
कुछ महीनों के इलाज का नतीजा डॉक्टर ने सिर्फ ऑपरेशन बताया।
ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया---- करीब 1 घंटे के बाद बाद अंदर से डॉक्टर ने आकर बताया कि ऑपरेशन नामुमकिन है ,क्योंकि बीमारी गले से होते हुए पूरी छाती के नीचे और पीछे पीठ में भी फैल गई है।
इस खतरनाक परिस्थिति में ऑपरेशन संभव ही नहीं है।
पर यह लापरवाही डॉक्टरों के कारण हुई ,ऐसा परिवार के लोगों का मानना था क्योंकि पापा को लेकर बड़ा बेटा पूरे 2 महीने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के चक्कर लगाता रहा।
डॉक्टरों के अनुसार हॉस्पिटल में बेड खाली ना होने की वजह से आज नहीं कल ,कल नहीं परसों ऑपरेशन की डेट आगे बढ़ती जा रही थी इतने बड़े हॉस्पिटल में एक बेड का मिलना नामुमकिन हो रहा था।
हॉस्पिटल के मरीजों को देख कर कैंसर से जूझती उनकी जिंदगी किस प्रकार दर्द और तकलीफ में गुजर रही है देख पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था।
मरीजों की तादाद इतनी ठीक के उनके लिए उचित रहने की व्यवस्था भी नहीं हो पा रही थी यहां तक कि पापा के लिए जमीन में अगर एक बेड डालकर ऑपरेशन के बाद रखा जा सके यह भी तय किया गया था पर जमीन पर भी एक बिस्तर डालकर मिलने की जगह नहीं मिल पा रही थी।
अब तो गिनती के दिन बचे हैं आप इन्हें घर ले जाएं,
गले में एक नली होल कर के फिट कर दी गई , जिससे सिर्फ लिक्विड जैसे---सूप, जूस, मूंग दाल का पानी आदि यह सब पेट भरने के लिए दिया जाता रहे।
और पेट में भी होल कर के एक नली सेट कर दी गई थी इस पेट मैं क्यों होल किया गया यह किसी की समझ में नहीं आया ना ही किसी के पास इतनी समझ थी कि डॉक्टर से पूछा जा सके के शरीर में दो-दो छेद करके इस प्रकार क्यों नलियां फिट करी हुई है।
घर आते ही -------- तबीयत देखने वालों का तांता लग गया।
देर रात तक यही क्रम चलता, पापा की उदारता ने सबको उनका चहिता बनाया था।
बस इसी कारण रात दिन देखने वालों की भीड़ लगी रहती।
समय-समय पर गले की नली से कभी सूप ,जूस ,पानी सभी प्रकार के लिक्विड दिए जाते थे।
पर----+-
गले की नली से जैसे डाला जाता, पेट की नली से सब बाहर आ जाता था।
और इस प्रकार नित्यक्रम से पेट की चमड़ी में जहां से सब पिलाया हुआ बाहर आता था वह पूरी जगह धीरे-धीरे जख्म का रूप लेने लगी।
बुरी तरह से छिल गया था पेट उस जगह से जहां से सब कुछ निकलता था।
जख्म रिसने लगे थे, लहू बहने लगा था।
हर थोड़ी देर में कपड़े से उस जगह को आहिस्ता आहिस्ता साफ करना और फिर उन कपड़ों को तुरंत गरम गरम डेटॉल के पानी में धोना।
उफ़ बयान के बाहर था सब कुछ और पापा-----
इस असहनीय दर्द को सह कर भी खामोश थे।
आवाज तो चली गई थी ,बोलना बंद हो गया था,कुछ कहना होता तो स्लेट में लड़खड़ाते हाथों से लिखते।
आज रात तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई-----
ऐसा प्रतीत होने लगा कि बस अब अगले पल कुछ ऐसा होने वाला है ,जिसका कि यहां सभी लोगों को पता है , कि बस अब मौत आ घेरेगी और अंधकार छा जाएगा।
कुटुंब की बड़ी -बूढी पापा की काकी ने अचानक सब को आदेश दिया कि----
जल्दी से जमीन पर लिटा दो, गंगाजल दो, ब्रजभूमि का चरणामृत मुंह में दो----
उनके आदेशों का पालन किया गया--++
पापा को जमीन पर लिटा दिया गया----
मां जिसको की कुछ देर पहले सब के समझाने पर सोने को कहा गया था अभी नींद लगी ही थी कि----
अचानक घबरा कर दूसरे कमरे से बाहर आकर चिल्लाने लगी---
यह सब क्या कर रहे हो तुम लोग---?
नहीं - नहीं इनको कुछ नहीं हो सकता उठाओ इनको----
अरे इनको तो हमेशा बहुत ठंड लगती है क्यों जमीन पर सुला कर रखा है।
काकी ने मां को डांट कर समझाने का प्रयास किया----
कि अब इनके पास ज्यादा वक्त नहीं है अच्छा होगा जो यह अपनी देह धरती पर त्यागे, इसलिए जमीन पर ही रहने दो
और
काकी पापा के पास जोर-जोर से भगवान का नाम लेने लगी----
पापा को भी कहती रही बोलो बेटा बोलो श्री कृष्ण शरणम् मम् , श्री कृष्ण शरणम मम्-------- राम - राम, राम राम
साथ ही सब को भी भगवान का स्मरण करने को कहती रही।
यह क्रम निरंतर लगातार चार रातों तक चलता रहा।
रोज रात होते पापा की तबीयत बहुत बिगड़ जाती ,रोज रात उन्हें जमीन पर सुलाया जाता।
मुंह में गंगाजल ,चरणामृत और ढेर सारी तुलसी जो पहले से ही तोड़ कर रखी थी वह भी मुंह में दी जाती।
किसी पंडित के कहने पर कि यह अमावस्या के 3 दिन निकल जाए तो अच्छा है।
बस घर के मंदिर में एक अखंड ज्योत जला दो----
इस आज्ञा का भी पालन किया गया----
अमावस्या भी बीत गई पर शायद अभी और ज्यादा पापा की सांसे लिखी थी जीने की, साथ ही और ज्यादा दर्द, तकलीफ सहना लिखा था।
आज सुबह से पापा के चेहरे पर बहुत नूर नजर आ रहा था।
देखने वालों का तांता अब भी लगा हुआ था।
शहर के बाहर रहने वाले सभी करीबी रिश्तेदार भी आ चुके थे।
अखंड ज्योत को अभी जलाए रखा हुआ था ,तेल डाल - डाल कर उसकी जिंदगी बढ़ाई जा रही थी।
हमने कई बार जा जाकर उसकी मध्यम होती लौ को बढ़ाकर जीवनदान दिया था।
क्योंकि मन में एक भ्रम था कि दीपक जलते रहने से पापा की जिंदगी भी बनी रहेगी।
शाम का धुंधलका घिरने लगा था----
पापा के सबसे प्यारे दोस्त पापा का हाथ पकड़ कर बैठे बातें कर रहे थे----
पापा उनकी कहीं वो बातें जो बहुत पुरानी हो चुकी थी यारी, दोस्ती बड़े मस्ती भरे बिताए दिनों को सुनकर बात-बात पर मुस्कुरा देते थे।
और फिर लड़खड़ाते हाथों से स्लेट पर कुछ अपने मन की बातें भी लिख रहे थे-----
मां पास बैठी पापा का माथा सहला रही थी---
पूरा परिवार सब पापा को घेरे हुए था।
पापा को देख ऐसा लग रहा था कि पापा तो अब ठीक हो गए हैं।
2 महीने की मझंलें बेटे की बेटी को देखने के लिए पापा ने अपनी इच्छा इशारे से जाहिर की ---
इतने दिनों से इसलिए इस बच्ची को और बाकी दो बच्चों को अपने पास नहीं आने दिया था क्योंकि पेट का जख्म जब मैं बहुत फैल गया था और खुला होने के कारण डर था पापा को कि कहीं बच्चो को इन्फेक्शन ना हो जाए और हर किसी को अपने से पापा दूर रखते थे कि किसी को कुछ ना हो जाए।
पेट की सफाई का काम सबसे ज्यादा बड़े बेटे की पत्नी बहुत सेवीभाव, लगन और प्यार से करती थी।
जब पापा को इस बीमारी ने नहीं डसा था तब सारा दिन दोनों बेटों के बच्चों संग खेलकर पूरा घर परिवार सर पर उठा लेते थे,
और अब अपनी आंखों के तारों को अपने मन पर पत्थर रख कर दूर करवाया था ।
आज बच्चों को पास बुलाकर प्यार से सर पर हाथ फेरा मानो आशीर्वाद दे रहे हो। और अलविदा कह रहे हो।
शाम ने हल्की हल्की कालिमा का आवरण ओढना शुरू किया, पंछी कलरव करते अपने नीड की ओर उड़ चले थे।
रोज के बोझल वातावरण से आज के वातावरण में थोड़ी आद्रता और खुशबू सी थी।
वहां उपस्थित हर एक व्यक्ति आज पापा से अपने मन के उदगार व्यक्त कर रहा था-----
घड़ी की सुइया टिक टिक करती अपने गंतव्य पर चढ़ाई चढ़कर अपनी मंजिल तय करने की होड़ में लगी थी।
पर अचानक----
इस पल को वक्त अब घर में थम सा गया------
मां की चीख से सारा वातावरण कृंदित हो गया----
आज पहली बार मैंने शरीर से प्राण कैसे निकलते हैं------देखा
उफ़
कितनी शांति थी पूरे शरीर में और मुख मंडल मै ,आंखें कितनी खुश नजर आ रही थी , कितनी कोमलता से पापा के प्राण धीरे-धीरे उनकी देह
का साथ छोड़ते हुए खुली आंखों से बाहर निकल गये-----
देह के इस पिंजरे से फड़फड़ाते जख्मी पंछी को आज आजादी मिल गई थी।
मुस्कुराता मुख मंडल, अब भी मुस्कुरा रहा था।
अब देखो ना किसी को समझ ही नहीं आया कि कुछ देर में पापा की जिंदगी हम सबका साथ छोड़ देगी।
वह सब बड़े बुजुर्ग अब तक जिन्होंने ना जाने कितनी बार पापा की जीवित देह जमीन पर रखी थी ,पर अभी उनको भी धोखा हो गया।
उनको भी पता नहीं चल पाया कि
कुछ ही पल में पापा की देह शरीर त्यागने वाली है , घर में कोहराम मच गया ------ हौसला तोड़ता परिवार के सदस्यों का क्रंदन ---------- सब कुछ असहनिय तो था पर निर्धारित था ।
आनन-फानन बर्फ की पेटी आ गई,
तो मां चीख कर बोली------
क्योंकि रात को शवयात्रा, और दाह संस्कार करना शायद शास्त्रों में वर्जित है इसलिए सुबह है दाह संस्कार करना निश्चित हुआ था।
नहीं----नहीं इनको हमेशा बहुत ही ठंड लगती है इनको बर्फ पर मैं नहीं रखने दूंगी------मत रखो इनको जमीन पर इन्हें जरा सी भी ठंड में तुरंत ही सर्दी हो जाती है मैं हमेशा इनका बहुत इन सब बातों का ख्याल रखती हूं----
मां की बातें सब को और ज्यादा दर्द के गर्त में ले जा रही थी, परेशान कर रही थी,
चीखते रोते मां बेहोश हो गई किसी ने डॉक्टर बुलाने को कहा।
पूरी रात पापा बर्फ की शैया पर थे।
आज उनको शूल शैया से ,अपनी बहुत ही दर्द देती कैंसर की तकलीफ, परिवार को अपने दुख से दुखी होते देख , और अपने आपको स्वयं को पल-पल मरते देखती जिंदगी से मुक्ति मिल गई--------
पूरे 20 दिन तक यह नियति का चक्र पापा की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमता रहा।
20 दिन के इस चक्र ने ना जाने सब के कितने अरमानों को ,कितने सपनों को ,और सबसे ज्यादा पापा को जीने की तमन्ना के तहत पल पल खत्म होती जिंदगी के पल खत्म किए।
शूल सैया से मुक्ति मिल गई थी,
भीष्म पितामह की भान्ति कृष्ण ने मानो आज पापा का उद्धार किया।

डॉ प्रियंका सोनी" प्रीत"
जलगांव
मोबाइल----9765399969

Read More

?? वापसी??

सुभाष पर वज्रपात हुआ
नशे को जीतने का भ्रम टूटा
जब 17 साल का बेटा और 15 साल की बेटी को ड्रिंक करते देखा और साथ में उनकी बातें सुनकर शर्म से पानी पानी हुआ।
बेटा कह रहा था अपनी बहन से कि तुम्हें नहीं मालूम मैं तो पापा द्वारा किए जुल्म को, गालियों और तकलीफ को भुलाने उनकी ही शराब की बोतल से निकालकर पीता हूं और उसमें पानी मिला देता हूं ताकि पापा को पता ना चले।
बहुत दिनों से सुभाष की समझ के बाहर हो रहा था कि-------
वह तो बरसों से शराब पीता आ रहा है, पर ये अचानक उसे नशा चढ़ना क्यों कम हो गया है।
वह खुश हो रहा था कि उसने नशे पर विजय पा ली है, अब वो जितनी जी चाहे पी ले उसे नशा नहीं चढ़ेगा।
और यही बात दोस्तों को बताई----
आज 31 दिसंबर नए साल के स्वागत पर घर की बजाय दोस्तों के साथ होटल में जश्न मनाना बेहतर समझा।
पर यह क्या जैसे हीआज की शराब हलक के नीचे उतरी सर चढ़कर बोलने लगी।
दोस्तों के बीच हंसी का पात्र बन गया।
खैर-------
देर रात घर पहुंचने पर लड़खड़ाते हुए दरवाजा आहिस्ता से अपने पास की चाबी से खोला ताकी दोनों बच्चे उठ ना जाएं ,पत्नी तीन-चार दिन से अपनी मां के यहां गई हुई थी।
डगमगानते कदमों से बेटे के कमरे के पास उस के कदम ठिठक कर रुक गए-------
अंदर का दृश्य देख उसका नशा काफूर हो गया-----
बच्चों को अपनी ही लाई बोतल से ड्रिंक करते देख और नशे की हालत में उसकी खुद अपनी सभी बुराइयों व बच्चों पत्नी पर किए जुल्म की दास्ताने सुन उसका कलेजा फटना चाह रहा था।
बच्चों के अनुसार वह एक अच्छा पिता तब होता था जब वह दिन में ड्रिंक नहीं करता था तब पूरे परिवार का खयाल रखकर उनकी सभी फरमाइशो को भी पूरी करता था पर रात को नशे में अपने किए सब कामों पर पानी फिर देता था।
बच्चों पर भी नशा हावी था ,और वो दोनों एक अच्छे पापा की ख्वाहिश पर रो भी रहे थे।
आत्मग्लानि से भरे उसके दिल और आत्मा ने उसे धिक्कारा।
अचानक दरवाजा खोलो अंदर दाखिल हुआ----
पापा को सामने और स्वयं का इस प्रकार ड्रिंक करते पकड़े जाने पर थरथर कांपने लगे कि अब फिर पापा की मार खानी पड़ेगी।
पर यह क्या---
शराब की बोतल की जोर से टूटने की आवाज आ------ई
दोनों बच्चों को अपने सीने से लगा सुभाष फूट-फूटकर रो पड़ा-----
बस अब और नहीं अब मैं इस परिवार में एक और सुभाष नहीं बनने दूंगा।
अगर मेरे पिता ने भी कभी मुझे मारा या समझाया होता तो तुम्हारा पापा ऐसा कभी नहीं होता।
मेरी प्यारी बच्ची तुमको पीते देख मैं आज इतना शर्मिंदा हूं जिसे मैं बयान नहीं कर सकता एक बाप के सामने बेटी का यह रूप कोई भी पिता नहीं देख सकता।
मुझे माफ कर दो
माफ कर दो।
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"
जलगांव

Read More

लिव इन रिलेशन
मंत्री जी की आज मायानगरी मुम्बई मै मिटिंग सम्मान व भाषण था
काम से निपटते बेटी को मिलने का प्लान बनाया
डोर बेल बजाते दरवाजा एक नवयुवक ने खोला
आश्चर्य चकित हो वो उसका मुंह तकने लगे पल को लगा कि गलत दरवाजे पर तो दस्तक नही दे दी
अरे जानू कौन है
अरे पापा आप कहते हुए बेटी अपने अस्त व्यस्त कपडे ठीक करने लगी
बाप का कलेजा कांप गया
झन्नाटेदार थप्पड से माहौल गुंज गया।

मैने सोचा कि मै यहां आकर तुझे सरप्राईस दु
पर तूने तो मुझे ही सरप्राइस दे दिया
पुछने पर पता चला कि हम लिविंग रिलेशन शिप मै रहते है
सब कुछ समेट पढाई छुडवा कर अपनी इज्जत की खातिर बेटी को घर ले आये
बेटी से उसी लडके से शादी का पूछा
जवाब मिला कि हमारे बीच शादी जैसी चीज का कोई कमिन्टमेन्ट नही है
बेटी का रिश्ता अच्छा घर वर देख कर पक्का हुआ
मंत्री जी ने सोचा कि बेटी के बीते कल की बातो से आने वाले भविष्य मै कोई प्राबलम ना आये कही शादी के बाद पता चलने पर लडका छोड न दे
ये सोच उन्हौने होने वाले दामाद को अपने मन की व्यथा बयान करते हुए कहा
बेटा एक बात कहना चाहता हुं वो ये कि
शालू जब मुम्बई मै पढती थी तब वो किसी लडके के साथ लिविंग रिलेशन मै थी
ओर ये मैने
तुम्हारे आगे कि जिन्दगी मै प्राबलम न आए इसलिये बताना उचित समझा
अरेअंकल इसमै क्या बडी या घबराने की बात है
मुझे कोई प्राबलम नही है
मै तो खुद भी लिवींग रिलेशन मै था
डाँ़प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More

सुनो ना
आज की शाम का मौसम बहुत खूबसूरत है । चलो
चलते हैं उसी जगह , जहां कई लम्हे ,कई पल ,कई घंटे, हमने साथ साथ बिताए थे। मूंगफली चने और मुरमुरे खाए थे,
माली से छुपके फूल तोड़ हमारे बालों में लगाए थे।
सबकी नजरों से बचते बचाते हैं,
सबसे सुनसान जगह पर
जिंदगी को बाहों में भर,
कभी पेशानी पर कभी अधरों पर
चुंबन बरसाए थे।
गोद में सर रख सोने की तमन्ना,
हाथों का स्नेहिल प्यार भरा स्पर्श,
आज भी मेरे एहसासों में जिंदा है।
आज भी तू मुझ में जिंदा है।
रक्त स्त्राव मैं बहता तूफ़ान सा
मेरे रोम रोम में तू ही तू,
पार दर्शित दिखाई देता है।
लम्हातो में बितती जिंदगी,
को फिर एक शास्वत सत्य दे जाना है।
तेरे साथ हां तेरे साथ फिर उसी जगह जाना है।

डॉं प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More

?बेगुनाही की सजा? सुबह सुबह मोहल्ले के सामने वाले घर में शोर सुन नीता ने फ्लैट की खिड़की खोल देखा तो पाया सामने एक सिंधी परिवार के मुखिया के मौत हो गई है।
पर नीता की नजर में वह जिंदा था ही नहीं क्योंकि उसे शराब की बुरी लत थी रोज रात दिन शराब पीकर बच्चों और
अपनी पत्नी को भी मारता पीटता पत्नी जैसे तैसे लोगों के कपड़े सी सी कर घर चलाती थी, उस पर भी उसको संतोष नहीं था उसके कमाए रुपए पैसे हड़प कर दारू में उड़ा देता था। ऐसे इंसान का जिंदा रहना उसके वजूद को स्वीकारना नीता का दिल गवाही नहीं देता था
अर्थी की विदाई होने के बाद जिंदगी मै शायद पहली बार यह अचंभा देखा हां हमारे लिए यह अचंभा ही था की उस व्यक्ति की पत्नी को घर की बड़ी बुजुर्ग औरतें घर के बाहर लाकर चारों तरफ से घेर कर खड़ी हो गई और उस पर बाल्टी में पानी भर कर उसके ऊपर डालने लगी वह बेचारी सूखी हड्डियों का ढांचा थी कपड़े समेत पानी से भीगते हुए भी उसकी कंपकंपी आसानी से दिखी जा सकती थी ।
मुझे यह रिवाज कुछ समझ में नहीं आया कि घर के बाहर किसी नारी को इस प्रकार से नहलाया जाए।
मुझसे रहा नहीं गया तो फ्लैट के नीचे रहते सिंधी परिवार की एक दादी से पूछा की दादी आपके यहां यह कैसा रिवाज है
दादी बोली हमारे में यही रिवाज है कि पति के मरने के बाद उसकी पत्नी को घर में नहीं ले जाया जाता तब तक कि उसे बाहर ही स्नान ना करा दिया जाए।
हमारा दिमाग शून्य पड़ गया सोचने समझने की क्षमता खत्म हो गई ऐसा मुझे प्रतीत होने लगा अचानक दादी से पूछा
दादी क्या आप के समाज में पति के मरने से पत्नी को इस प्रकार से घर के बाहर स्नान कराया जाता है तो क्या पत्नी के मरने के बाद पति को भी इस प्रकार बाहर खड़ा करके स्नान कराया जाता है।
दादी गुस्से मैं चीखती सी बोली तू पागल है क्या है। ऐसा भी कभी होता है, के मर्द को बाहर नहलाया जाए ,मर्द के लिए थोड़ी ना यह नियम है।ये तो औरत के मरने पर नही बल्कि पति के मरने पर पत्नि केलिए नियम है। पति तो घर का रखवाला है,परिवार चलाने वाला है, उस पर विधवा का सिक्का थोड़ी ना लगता है यह तो विधवा औरतों के लिए बनाए गए नियम है।
वाह दादी कितने अच्छे नियम बनाए गए हैं पति के जीते जी अगर पति खराब है शराबी है ,तो औरत को दुख दर्द सह कर पति के होते हुए भी विधवा सा जीवन जीना पड़ता है। पति के मरने के बाद तो उसे घर के बाहर नहला कर बेइज्जत कराया जाता है ।
यानि कि उसका अपना कोई अस्तित्व नही है ,कोई मान सम्मान नहीं है। जब जिसका जैसा जी चाहा उसके साथ व्यवहार किया और स्त्री मुक बनी गुनहगार ना होते हुए भी गुनहगार साबित होती गई।
वाह रे हमारे थोथे थोपे गए रीती रिवाज।
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More

काव्योत्सवस भाग 2
बिषय,,,,,,छन्दमुक्त श्रृंगार रस कविता

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"
गज़ल
. वो तबस्सुम से समय से मेरा दर्द बढ़ा देते हैं।
अपने बीमार को क्या खूब सजा देते हैं।

आंखों आंखों में किए जाते हैं घायल मुझको।
बातों बातों में मेरे गम को बढ़ा देते हैं।

जान लेकर ही हटेंगे यह ग़मों के साए
दिल पर लिख लिख के मेरा नाम मिटा देते हैं।

रंग बनकर कहीं उड़ने को मैं चाहूं भी अगर
बेड़ियां पांव में है ऐहबाब लगा देते हैं।

कितना कांटों भरा है "प्रीत" का रस्ता लेकिन
हम लोगों से जिसे गुलजार बना देते हैं

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

Read More
epost thumb