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लिव इन रिलेशन
मंत्री जी की आज मायानगरी मुम्बई मै मिटिंग सम्मान व भाषण था
काम से निपटते बेटी को मिलने का प्लान बनाया
डोर बेल बजाते दरवाजा एक नवयुवक ने खोला
आश्चर्य चकित हो वो उसका मुंह तकने लगे पल को लगा कि गलत दरवाजे पर तो दस्तक नही दे दी
अरे जानू कौन है
अरे पापा आप कहते हुए बेटी अपने अस्त व्यस्त कपडे ठीक करने लगी
बाप का कलेजा कांप गया
झन्नाटेदार थप्पड से माहौल गुंज गया।

मैने सोचा कि मै यहां आकर तुझे सरप्राईस दु
पर तूने तो मुझे ही सरप्राइस दे दिया
पुछने पर पता चला कि हम लिविंग रिलेशन शिप मै रहते है
सब कुछ समेट पढाई छुडवा कर अपनी इज्जत की खातिर बेटी को घर ले आये
बेटी से उसी लडके से शादी का पूछा
जवाब मिला कि हमारे बीच शादी जैसी चीज का कोई कमिन्टमेन्ट नही है
बेटी का रिश्ता अच्छा घर वर देख कर पक्का हुआ
मंत्री जी ने सोचा कि बेटी के बीते कल की बातो से आने वाले भविष्य मै कोई प्राबलम ना आये कही शादी के बाद पता चलने पर लडका छोड न दे
ये सोच उन्हौने होने वाले दामाद को अपने मन की व्यथा बयान करते हुए कहा
बेटा एक बात कहना चाहता हुं वो ये कि
शालू जब मुम्बई मै पढती थी तब वो किसी लडके के साथ लिविंग रिलेशन मै थी
ओर ये मैने
तुम्हारे आगे कि जिन्दगी मै प्राबलम न आए इसलिये बताना उचित समझा
अरेअंकल इसमै क्या बडी या घबराने की बात है
मुझे कोई प्राबलम नही है
मै तो खुद भी लिवींग रिलेशन मै था
डाँ़प्रियंका सोनी "प्रीत"

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सुनो ना
आज की शाम का मौसम बहुत खूबसूरत है । चलो
चलते हैं उसी जगह , जहां कई लम्हे ,कई पल ,कई घंटे, हमने साथ साथ बिताए थे। मूंगफली चने और मुरमुरे खाए थे,
माली से छुपके फूल तोड़ हमारे बालों में लगाए थे।
सबकी नजरों से बचते बचाते हैं,
सबसे सुनसान जगह पर
जिंदगी को बाहों में भर,
कभी पेशानी पर कभी अधरों पर
चुंबन बरसाए थे।
गोद में सर रख सोने की तमन्ना,
हाथों का स्नेहिल प्यार भरा स्पर्श,
आज भी मेरे एहसासों में जिंदा है।
आज भी तू मुझ में जिंदा है।
रक्त स्त्राव मैं बहता तूफ़ान सा
मेरे रोम रोम में तू ही तू,
पार दर्शित दिखाई देता है।
लम्हातो में बितती जिंदगी,
को फिर एक शास्वत सत्य दे जाना है।
तेरे साथ हां तेरे साथ फिर उसी जगह जाना है।

डॉं प्रियंका सोनी "प्रीत"

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🌹बेगुनाही की सजा🌹 सुबह सुबह मोहल्ले के सामने वाले घर में शोर सुन नीता ने फ्लैट की खिड़की खोल देखा तो पाया सामने एक सिंधी परिवार के मुखिया के मौत हो गई है।
पर नीता की नजर में वह जिंदा था ही नहीं क्योंकि उसे शराब की बुरी लत थी रोज रात दिन शराब पीकर बच्चों और
अपनी पत्नी को भी मारता पीटता पत्नी जैसे तैसे लोगों के कपड़े सी सी कर घर चलाती थी, उस पर भी उसको संतोष नहीं था उसके कमाए रुपए पैसे हड़प कर दारू में उड़ा देता था। ऐसे इंसान का जिंदा रहना उसके वजूद को स्वीकारना नीता का दिल गवाही नहीं देता था
अर्थी की विदाई होने के बाद जिंदगी मै शायद पहली बार यह अचंभा देखा हां हमारे लिए यह अचंभा ही था की उस व्यक्ति की पत्नी को घर की बड़ी बुजुर्ग औरतें घर के बाहर लाकर चारों तरफ से घेर कर खड़ी हो गई और उस पर बाल्टी में पानी भर कर उसके ऊपर डालने लगी वह बेचारी सूखी हड्डियों का ढांचा थी कपड़े समेत पानी से भीगते हुए भी उसकी कंपकंपी आसानी से दिखी जा सकती थी ।
मुझे यह रिवाज कुछ समझ में नहीं आया कि घर के बाहर किसी नारी को इस प्रकार से नहलाया जाए।
मुझसे रहा नहीं गया तो फ्लैट के नीचे रहते सिंधी परिवार की एक दादी से पूछा की दादी आपके यहां यह कैसा रिवाज है
दादी बोली हमारे में यही रिवाज है कि पति के मरने के बाद उसकी पत्नी को घर में नहीं ले जाया जाता तब तक कि उसे बाहर ही स्नान ना करा दिया जाए।
हमारा दिमाग शून्य पड़ गया सोचने समझने की क्षमता खत्म हो गई ऐसा मुझे प्रतीत होने लगा अचानक दादी से पूछा
दादी क्या आप के समाज में पति के मरने से पत्नी को इस प्रकार से घर के बाहर स्नान कराया जाता है तो क्या पत्नी के मरने के बाद पति को भी इस प्रकार बाहर खड़ा करके स्नान कराया जाता है।
दादी गुस्से मैं चीखती सी बोली तू पागल है क्या है। ऐसा भी कभी होता है, के मर्द को बाहर नहलाया जाए ,मर्द के लिए थोड़ी ना यह नियम है।ये तो औरत के मरने पर नही बल्कि पति के मरने पर पत्नि केलिए नियम है। पति तो घर का रखवाला है,परिवार चलाने वाला है, उस पर विधवा का सिक्का थोड़ी ना लगता है यह तो विधवा औरतों के लिए बनाए गए नियम है।
वाह दादी कितने अच्छे नियम बनाए गए हैं पति के जीते जी अगर पति खराब है शराबी है ,तो औरत को दुख दर्द सह कर पति के होते हुए भी विधवा सा जीवन जीना पड़ता है। पति के मरने के बाद तो उसे घर के बाहर नहला कर बेइज्जत कराया जाता है ।
यानि कि उसका अपना कोई अस्तित्व नही है ,कोई मान सम्मान नहीं है। जब जिसका जैसा जी चाहा उसके साथ व्यवहार किया और स्त्री मुक बनी गुनहगार ना होते हुए भी गुनहगार साबित होती गई।
वाह रे हमारे थोथे थोपे गए रीती रिवाज।
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

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काव्योत्सवस भाग 2
बिषय,,,,,,छन्दमुक्त श्रृंगार रस कविता

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"
गज़ल
. वो तबस्सुम से समय से मेरा दर्द बढ़ा देते हैं।
अपने बीमार को क्या खूब सजा देते हैं।

आंखों आंखों में किए जाते हैं घायल मुझको।
बातों बातों में मेरे गम को बढ़ा देते हैं।

जान लेकर ही हटेंगे यह ग़मों के साए
दिल पर लिख लिख के मेरा नाम मिटा देते हैं।

रंग बनकर कहीं उड़ने को मैं चाहूं भी अगर
बेड़ियां पांव में है ऐहबाब लगा देते हैं।

कितना कांटों भरा है "प्रीत" का रस्ता लेकिन
हम लोगों से जिसे गुलजार बना देते हैं

डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"

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