उपन्यास - देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश,रेत होते रिश्ते, आखेट महल, सेज गगन में चांद की, जल तू जलाल तू, अकाब, कहानी संग्रह - अंत्यास्ता, सत्ताघर की कंदराएं,ख़ाली हाथ वाली अम्मा, थोड़ी देर और ठहर,। मेरी सौ लघुकथाएं,दो तितलियां और चुप रहने वाला लड़का। संस्मरण - रास्ते में हो गई शाम, इजतिरार

विक्रम और वेताल
एक किसान खेत में काम कर रहा था। तभी उसने देखा कि खेत के किनारे बैठे उसके दस वर्षीय बेटे के पास कहीं से भटकता हुआ एक शेर का छोटा सा बच्चा आ गया। किसान घबराया किन्तु लड़के ने शेर के बच्चे को गोद में उठा लिया। बच्चा प्यार से उसका हाथ चाटने लगा। शाम को दोनों उसे अपने साथ घर ले आए।
लड़के ने शेर के बच्चे को पाल लिया। अब वो रोज़ उसे घुमाता, उसके साथ खेलता और खुश होता।
कुछ दिन बाद जब बच्चा बड़ा होने लगा तो किसान को डर लगा कि ये कहीं हिंसक होकर गांव में कोई परेशानी खड़ी न कर दे। उसे खिलाना पिलाना भी अब मंहगा पड़ने लगा।
लोगों ने किसान को राय दी कि इसे राजा को दे दो। राजमहल में इसका लालन - पालन भी हो जाएगा। किसान लड़के को साथ लेकर गया और पूरी बात बता कर उस युवा होते शेर को राजा को सौंप दिया।
राजा खुश हुआ।
राजा ने अब अपने दरबारियों से कहा कि महल में हमसे बड़ी मूंछें किसी की नहीं हो सकतीं, लिहाज़ा शेर की मूंछें काट दी गईं।
एक दिन राजा ने कहा- इसके चलने से पैर के नाखूनों से पक्के फर्श पर भद्दी आवाज़ आती है। अतः शेर के नाखून भी काट दिए गए।
फ़िर राजा बोला- ये अपना भोजन इस तरह काट काट कर चबाता है कि मुंह से अजीब सी आवाज़ आती है।शेर के दांत भी काट दिए गए।
राजा ने शिकायत की- देखो इसके बाल किस तरह झड़ते रहते हैं, गंदगी होती है।
शेर के बाल भी काट दिए गए।
शाम को घूमने पर राजा ने कहा- ये शेर साथ में इधर उधर भागता है, जिससे लोग डरते हैं।
दरबारियों ने उसके गले में पट्टा डाल दिया।
राजा को शिकायत थी कि शेर की आंखें कितनी खूंखार और डरावनी हैं।
दरबारियों ने शेर को काला चश्मा पहना दिया।
एक दिन किसान के लड़के को शेर की याद आयी। वह शेर को देखने राजमहल में चला आया।
जैसे ही शेर लड़के के सामने आया, वह लड़के को देखकर खुशी से चिल्ला उठा- ही ही ही ही...
इतनी कहानी सुना कर वेताल ने विक्रमादित्य से कहा- राजन,शेर तो दहाड़ता है,पर राजा का वो पालतू शेर दहाड़ने की जगह हीही करके हंसा क्यों? यदि इस प्रश्न का उत्तर तुमने जानते हुए भी नहीं दिया तो तुम्हारा सिर टुकड़े टुकड़े हो जाएगा।
विक्रम ने कहा- शेर राजा के महल में रहता था। वो हमेशा राजा के दरबारियों को राजा के सामने ऐसे ही बोलते हुए सुनता था, इसलिए उसे और कुछ आता ही न था। अतः अपने मित्र किसान के लड़के को देखकर उसने अपनी खुशी ऐसे ही जाहिर की।
इस प्रकार विक्रम का मौन भंग होते ही वेताल उड़ कर जंगल में अदृश्य हो गया।

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मैं हो गया !
क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपने किसी से कुछ नहीं कहा, किसी ने आपसे कुछ नहीं कहा, और बस दो लोगों को आपस में बातें करते हुए देख - सुन कर आप फूल कर कुप्पा हो गए हों?
मैं चुपचाप खड़ा था। मेरे पास बंगाल से निकलने वाली एक पत्रिका के संपादक खड़े थे। तभी एक विद्वान पाठक ने उनसे कहा - " आप अपनी पत्रिका में प्रबोध कुमार गोविल को प्रबोध कुमार गोबिल क्यों लिखते हैं?"
संपादक महोदय ने तत्काल उत्तर दिया- "आपसे बदला लेने के लिए !"
वे हैरान होते हुए बोले- "हमसे बदला क्यों? हमने क्या किया है?"
संपादक जी बोले - "आप भी तो रोबिंद्र नाथ टैगोर को रवीन्द्र नाथ टैगोर लिखते हैं!
मुझे नहीं पता कि उन पाठक महाशय का क्या हुआ पर मैं तो फूल कर....

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इन्हीं की तरह

शहर का वह चौराहा अक्सर सुनसान रहता था क्योंकि वह कुछ बाहरी जगह थी, जहाँ यातायात के साधन कुछ कम आते थे। वहीँ एक किनारे बने छोटे से मंदिर के बाहर दो भिखारी रहते थे। शरीर से अपंग लाचार भिखारी थे, सो रहना क्या, दिन भर में जो कुछ मिल गया, पेट में डाला, मंदिर के पिछवाड़े लगे नल से पानी पिया, और पड़े रहे। 
एक वृद्धा अक्सर सुबह के समय मंदिर आया करती थी।  वह आरती करती और कुछ थोड़ा बहुत प्रसाद उन दोनों के आगे डाल कर अपने रास्ते चली जाती।
एक दिन बुढ़िया उन दोनों के आगे प्रसाद का दौना रख ही रही थी, कि  उनकी बदबू, गंदगी और आलस्य से खिन्न होकर बोल पड़ी- "अरे, पानी का नल पास में लगा है, और कुछ नहीं करते तो कम से कम हाथ-मुंह तो धो लिया करो।"
एक भिखारी बोल पड़ा- "माँ,एक दिन मैं नहाया था, उस दिन मैंने देखा कि  मेरे पास एक मक्खी भी नहीं फटकी।  जबकि रोज़ सैंकड़ों मक्खियाँ यहाँ मेरे तन पर भिनभिना कर गंदगी से अपना भोजन पाती हैं। तब मैंने सोचा,क्या मुझे किसी का भोजन छीन कर उसे दरबदर करने का अधिकार है?"
वृद्ध महिला अब सोच रही थी कि शायद शहरवासी भी इन्हीं की तरह सोच पाते तो ये भिखारी काहे को बनते।               

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नमक
एक लड़का और लड़की स्कूल से भागकर सागर किनारे घूमने अा गए। वे लिपट कर एक दूसरे में खोए हुए थे कि उनकी किताबों से एक दोहा और एक क्षणिका निकल कर पानी में जा गिरी।
बहते- बहते दोनों एक निर्जन द्वीप में पहुंच गए। अब कोई चारा नहीं था, दोनों ने एक दूसरे को हिम्मत बंधाते हुए आपस में शादी की और पति पत्नी बन रहने लगे। दोहा दिनभर भटक कर फल- फूल लाता और क्षणिका घर संभालती।
कुछ दिन बाद दोनों के एक संतान हुई। प्यार से दोनों ने उसका नाम रख दिया- लघुकथा!
एक दिन नन्ही लघुकथा पानी के किनारे खेल रही थी कि उसने एक बजरे पर सवार होकर कुछ लोगों को आते देखा।
उसने इस द्वीप पर कभी इंसान देखे न थे, लिहाज़ा किलक कर उन सब को मेहमान बना कर अपने घर ले आई।
वे सभी विद्वान मनीषी गण थे जो किसी अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी से चिंतन- मनन करके लौट रहे थे।
दोहा और क्षणिका बेटी के मेहमानों की आवभगत में जुट गए।
क्या नाम है बिटिया का? एक महाशय ने पूछा।
क्षणिका ने लजाते हुए कहा- लघुकथा!
- वाह! सभी के मुंह से निकला।
एक मनीषी बोले- "ये ध्यान रखिएगा कि इसका वजन चालीस किलो से ज़्यादा न बढ़े!"
दूसरे विद्वान ने कहा- "अगर इसकी लंबाई चार फिट से ज़्यादा हो जाए तो इसकी गर्दन थोड़ी काट दीजिएगा।"
- "ये या तो हंसे या फ़िर रोए, दोनों भाव इसके चेहरे पे कभी न आएं"... तीसरे सज्जन बोल ही रहे थे कि मां हत्थे से ही उखड़ गई। उसने मेहमानों के लिए जो मछली बनाई थी,वो बिना नमक के ही परोस दी।
जब अतिथियों ने नमक मांगा तो मां बोली- नमक तो ख़त्म हो गया, आप सब लोग रो लो, आपके आंसुओं से नमक निकल आयेगा!

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आज सुबह की ही बात है। सड़क पर एक फल वाला आवाज़ लगाता हुआ जा रहा था- मीठा मतीरा, मीठा मतीरा...लाल मतीरा।
एक घर की खिड़की से आवाज़ आई - ओ तरबूज वाले, क्या भाव दिया तरबूज?
जो सज्जन भाव पूछ रहे थे, उनका छह वर्षीय बेटा बोल पड़ा - पापा, वॉटरमेलन ले लो न ! मुझे वाटरमेलन खाना है।
मैं ये सब आवाज़ें सुन कर सोच में डूब गया।
हम तीन भाषाओं का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय भाषा, राजभाषा और अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में अपनी आने वाली पीढ़ी पर अनावश्यक बोझ डाल रहे हैं किन्तु शायद नई पीढ़ी भाषा के मुद्दे पर हमारा छल छद्म समझने लगी है और अपना रास्ता वो खुद चुनने की ओर बढ़ रही है।

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बीस साल बाद

अपने स्कूल में बैठी वे दोनों छोटी लड़कियां बड़े ध्यान से सुन रही थीं, उनका टीचर बता रहा था कि आप गले में हीरे का हार पहन सकते हैं, और यदि न चाहें तो न भी पहन सकते हैं।
टीचर ने कहा- "यदि आप हार नहीं पहनते तो अपने मन में सोचिये, कि जिस धरती पर हम चल रहे हैं,उसके गर्भ में तो हज़ारों हीरे दबे पड़े हैं, इन्हें गले में क्या लटकाना ? लेकिन यदि आप हीरे का हार पहनते हैं तो सोचिये- वाह ! अद्भुत ! मेरे गले का हार कितना लाजवाब और कीमती है।" [ अर्थात दोनों स्थितियों में सुखी और संतुष्ट रहिये]
संयोग देखिये, कि एक लड़की ने हार पहन लिया और दूसरी ने नहीं पहना।
बीस साल गुज़र गए। 
पहली लड़की जिस गाँव में रहती थी वह अब एक शहर बन चुका था। वहां सुनारों की कई दुकानें थीं।  पास ही एक बढ़ई ज्वैलरी के खूबसूरत बक्से बनाता था। एक लोहार ने सांकलें बनाने की छोटी सी दुकान खोल ली थी। नज़दीक ही एक तालों की फैक्ट्री थी।  दवा-दारु के लिए छोटे-बड़े क्लिनिक खुल गए थे। पास ही पुलिस थाना था।  एक सेंटर में बच्चे सुरक्षाकर्मी बनने की ट्रेनिंग लेते थे।  बैंक खुल गए थे जो पैसा भी देते थे और गहने रेहन भी रखते थे।  लड़के-लड़कियाँ ज्वैलरी डिज़ाइनिंग सीखते थे।  गाड़ी -घोड़े दिनभर दौड़ते थे, सड़कें चौड़ी हो गई थीं, प्रदूषण मिटाने को बाग़-बगीचे लगा दिए गए थे।रोजगार के लिए आसपास के गाँवों से लोग वहां आते थे। 
दूसरी लड़की जिस गाँव में रहती थी, वहां का पर्यावरण बड़ा सुहाना था।  पर्वत, जंगल, झरने, हरियाली सबका मन मोहते थे। वहां की सादगी और आबो-हवा दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। गाँव में शांति का वास था, लोग रोज़गार के लिए आसपास चले गए थे।     

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वे क्यों लिखते हैं? वे क्या लिखते हैं? वे कैसे लिखते हैं? वे कितना लिखते हैं? वे कब लिखते हैं? वे किसके लिए लिखते हैं? वे कब तक लिखेंगे? वे न लिखें तो क्या हो? उन्होंने लिखा तो क्या हो गया? क्या बाक़ी है जो वे और लिखना चाहते हैं?
कुछ ऐसे ही थे हमारे सवाल...और देखिए कि कैसे हैं उनके जवाब!

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और खरगोश फिर हार गया कछुए से

खरगोश सुबह-सुबह तालाब के किनारे टहलने जा रहा था।  रास्ते में एक खेत से ताज़ा गाजर तोड़ कर वह उसे पानी से धो ही रहा था, कि इठलाती हुई एक बतख वहां आ गई।  दोनों में दोस्ती हो गयी।  बतख बोली- "लाओ, तुम्हारी गाजर का हलवा बना दूँ।"
हलवा तैयार हुआ तो बतख बोली- "जाओ, जल्दी से मुंह धोकर आओ, फिर हलवा खाना।"
खरगोश जब मुंह धोकर आया तो उसने बतख की केसरिया चोंच को देख कर मन ही मन सोचा, इसने ज़रूर पीछे से हलवा खाया है। 
उसने तालाब के थाने में जाकर चोरी की रपट लिखा दी।  थानेदार मेंढक बतख को गिरफ्तार करने चला आया। जब वह बतख को पकड़ने लगा तो बतख ने कहा-"तुम्हारे पास क्या सबूत है कि  मैंने हलवा खाया है?"
खरगोश बोला-"तुम्हारी चोंच और पंजे हलवे से लाल हो गए हैं !"
बतख घबरा कर बोली-"मैंने हलवा नहीं खाया, मेरी चोंच और पंजे तो इसी रंग के हैं।"  
शोर सुन कर तालाब से कछुआ निकल आया।  जब उसे सारी बात का पता चला तो वह फ़ौरन बोल पड़ा-"थानेदार जी,मैं एक खेत से कपास लाया था, उसका मैंने नर्म सफ़ेद कोट सिलवाया था, जो चोरी हो गया।  लगता है इस खरगोश ने वही कोट पहना है,गिरफ़्तार कर लीजिये इसे।"
खरगोश के यह सुनते ही होश उड़ गए। हक्का-बक्का होकर बोला-"मैंने कोट नहीं पहना, मेरा रंग तो सफ़ेद ही है।"
कछुआ बोला -"कुछ भी हो, अब तुम पर बतख की मानहानि का मुकदमा चलेगा। चलो मेरे साथ।"
खरगोश ने तुरंत सभी से माफ़ी मांगी, और बोला-"कछुए भैया ने आज मुझे दूसरी बार हराया है।"

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