उपन्यास - देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश,रेत होते रिश्ते, आखेट महल, सेज गगन में चांद की, जल तू जलाल तू, अकाब, कहानी संग्रह - अंत्यास्त, सत्ताघर की कंदराएं,ख़ाली हाथ वाली अम्मा, थोड़ी देर और ठहर,। मेरी सौ लघुकथाएं,दो तितलियां और चुप रहने वाला लड़का। संस्मरण - रास्ते में हो गई शाम, इजतिरार, लेडी ऑन द मून

कोई दोस्तों से मिलके उड़ाता
कोई लेके इनको,अकेले में जाता
सभी का मगर इनसे कोई तो नाता
होतीं सभी की मुरादें पतंगें !

पड़ता था घर के बड़ों को मनाना
कहते थे बाबा, थोड़ी उड़ाना
जैसा हो मौसम उसी से निभाना
देती हैं भटका,ज़्यादा पतंगें !

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हरी नीली पीली गुलाबी पतंगें
न जाने मगर कौन सी अब कहाँ है?

किसी-किसी के रंग, लगते सजीले
किसी-किसी के अंग,होते नशीले
किसी-किसी के तंग, थे ढीले-ढीले
तरसाती थीं दूर से भी पतंगें !

इन्हें देखते छत पे आते थे लड़के
गली में मिलीं, लूट लाते थे लड़के
पकड़ डोर जबभी, हिलाते थे लड़के
धरा से गगन पे, जातीं पतंगें !

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अपनी सफल फ़िल्मों में साधना ने हिंदी और उर्दू के मेल से उपजी एक ऐसी तहज़ीब का माहौल बनाया जिसे अपने बोलने- चालने, पहनने- ओढ़ने में नई पीढ़ी दिल से अपनाने लगी। एक ऐसा फ़लसफ़ा, जिसमें नफ़रत के लिए कोई गुंजाइश न हो। जहां खलनायकी की कोई जगह न हो।
मानवीय भावनाएं प्रेम, छल, कपट, ईर्ष्या, करुणा, क्रोध, सहानुभूति, सुंदरता, वासना...सब हों लेकिन हिंसा,नफरत, लड़ाई - झगड़ा आदि फ़िल्म के पर्दे पर जगह न पाएं।
आख़िर लोग यहां दिल बहलाने के लिए आते हैं, अपनी कमाई से टिकट खरीद कर आते हैं, आपको क्या हक है कि आप उन्हें जीवन विरोधी कथानक परोसें और उनके सपनों को नेस्तनाबूद करके अपनी तिज़ोरी भरें।

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प्रबोधकुमार गोविल पुराने दोस्त हैं,परम संतोषी, चुपचाप सृजनरत। किताब भेजकर चुप बैठ जाते हैं, कोई उलाहना नहीं, कोई तगादा नहीं। जयपुर में रहते हैं लेकिन पूरा विश्व घूमने की प्रक्रिया में हैं। उन्होंने एक बेहतरीन उपन्यास लिखा है-- अकाब- यानी बाज यानी विनाश का प्रतीक।इस उपन्यास का बैकड्रॉप विदेश है और पात्र भी दुनिया भर से तलाशे हुए।इस अर्थ में यह ग्लोबल उपन्यास हुआ।कथा खुलती है न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टॉवर के विध्वंस के बाद के अवाक और मातम में डूबे समय में। जापानी युवक तनिष्क, उसके अंकल मसरू, मां आसानिका, मां के पति और प्रेमी, अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिल्म निर्देशक अल्तमश, विश्व सुंदरी सेलिना नंदा और तनिष्क के जीवन के मायने बदल देने वाले शेख साहब और मध्यांतर के बाद आई अनन्या आदि चरित्रों को लेकर चल रहे इस उपन्यास का कैनवास विस्तृत होने के बावजूद जटिल नहीं है। तनिष्क की केंद्रीय कथा के समानांतर अनेक उपकथाएं भी उपन्यास में साथ चलती हैं।फाइव स्टार बन चुके सलून कल्चर का लेखक ने कमाल का रेखांकन किया है,ऐसा गहन अध्ययन से ही संभव है। बहुत बहुत तनाव और मुश्किल पलों से गुजरने के बाद उपन्यास का अंत तनिष्क और अनन्या के सहजीवन में खुल रहा होता है और हम इस अहसास से गुजरते हैं कि अकाब मानवीय जिजीविषा को परास्त नहीं कर सकता।यही इस उपन्यास का आशावाद है।
- धीरेन्द्र अस्थाना, मुंबई

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ये एक अजीब बात थी।
आर्यन को हर समय ऐसा लगता था जैसे कोई न कोई उसे छूता रहे। वह सड़क पर चलता तो रास्ते से जाने वाले हर शख़्स को देख कर यही सोचता कि ये इतने फासले से क्यों गुज़र रहा है? उससे सट कर क्यों नहीं निकलता?
कभी तेज़ हवा या आंधी चलती तो उसे अच्छा लगता। उसे महसूस होता कि हवा उसके बदन को रगड़ती हुई गुज़र रही है। अगर आंधी में धूल उड़ती तो सब लोग उससे बचते हुए कहीं ठहर जाते और आंधी के बगूले के गुज़र जाने की प्रतीक्षा किसी पेड़ या दीवार की ओट में खड़े रह कर करते।
मगर आर्यन के लिए ये एक मज़ेदार अहसास होता। धूल उसके तन से लिपटती हुई जाती तो उसे अच्छा लगता।
कोई गाय, कुत्ता या तितली भी निकले तो उसका बदन चाहने लगता कि उससे रगड़ खाते हुए निकले।
उसके अपने कपड़े भी अगर उसके शरीर से टकराते तो उसे बहुत अच्छा लगता।
वह इसी अहसास को जीने के लिए एकदम ढीले- ढाले कपड़े पहना करता। ताकि चलते - चलते उसके कपड़े हिलें और उसके तन को सहलाएं। लटकते कपड़े की हल्की गुदगुदी उसके मन में प्राण भर देती।
आख़िर उसने एक दिन डॉक्टर के पास जाने का फ़ैसला किया। डॉक्टर ने उसकी समस्या सुन कर उसे एक मनोचिकित्सक के पास भेज दिया।
मनोचिकित्सक ने कई दिन तक उससे बात की और उसे थैरेपी दी।
उसने ये भी कहा कि उसे कोई रोग नहीं है। ये केवल अहसास है जो कुछ ही दिनों में दूर हो जाएगा।
चिकित्सक ने बताया कि किसी महानगर से छोटे शहर या गांव में आने पर कुछ दिन ऐसा होता है। वहां हमें हर समय,हर जगह इतनी भीड़ की आदत हो जाती है कि यहां आने पर हमें लगने लगता है जैसे हर कोई हमसे बच -बच कर दूर- दूर से क्यों गुज़र रहा है? हम स्पर्श के लिए तरस जाते हैं, जो हमें बड़े शहर में स्वाभाविक रूप से ही मिलते रहते हैं।

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"सर्वेक्षण"
संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक विश्वव्यापी सर्वेक्षण करवाया जिसमें तमाम देशों से एक ही सवाल पूछा गया था, "निवेदन है कि अन्न की कमी के कारण बाकी की दुनिया में बढ़ रही भूखमरी को खत्म करने के उपाय के बारे में आपकी ईमानदार राय क्या है बताएँ।" संयुक्त राष्ट्र संघ इस सर्वेक्षण के जवाब के आधार पर गंभीर कदम उठाना चाहता था, लेकिन सर्वेक्षण बुरी तरह विफल रहा क्योंकि---
-- अफ्रीका के लोगों को "अन्न" क्या है यह पता नहीं था।
-- भारत के लोगों को "ईमानदार" क्या है यह पता नहीं था।
-- यूरोप के लोगों को "कमी" क्या है यह पता नहीं था।
-- चीन के लोगों को "राय" क्या है यह पता नहीं था।
-- मध्य एशिया के लोगों को "उपाय" क्या है यह पता नहीं था।
-- दक्षिण अमेरिका के लोगों को "निवेदन" क्या है यह पता नहीं था और
अमेरिका...
-- अमेरिका के लोगों को "बाकी दुनिया" क्या है यह पता नहीं था।

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